मुझे आपत्ति है....

हमारे सीरवी समाज  में महिलाओं के साथ जिस तरह का व्यवहार (बार-बार तलाक, अदला बदली कांसेप्ट) होता है, मुझे उस पर आपत्ति है और मैं इस बारे में ठोस राय रखता हूँ।  लेकिन मैं अपनी  राय प्रकट कर देता हूँ, तो उल्टा मुझे समझाते हैं,  ' चुप रहो, । इस बारे में राय देने वाले तुम कौन होते हो।"
दरअसल उनके साथ भेदभाव करने का रवैया, समाज में कूट-कूटकर भरा है।

अभी तो अपने समाज में अधिकतर महिलाओं को यह आभास भी नहीं है की वे शोषण का शिकार हो रही हैं और स्वयं एक अन्य महिला का शोषण करने में समाज को सहयोग कर रही है.

आज यह पूरे सीरवी समाज का दायित्व है कि वह नारी को बराबरी का स्थान दें। अब इसको कोई नारी मुक्ति का नाम दे या नारी शक्तिकरण का, उससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। नारी और पुरुष एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं बल्कि पूरक हैं। कहा भी गया है शिव शक्ति के बिना शव के समान हैं। राधा के बिना कृष्ण आधा हैं। नारियों की समस्या केवल उनकी समस्या नहीं है। यह पूरे समाज की समस्या है। या यूं कहिए सामाजिक समस्या का एक अंग है। साफ है कि नारी की स्थिति में बदलाव लाने के लिए पूरे सामाजिक ढांचे एवं सोच में बदलाव लाना जरूरी है।

       महिलाएं समाज से अपने लिए देवी का संबोधन नहीं मांगती हैं। स्त्रियों को देवी समझा जाए या नहीं लेकिन कम से कम उन्हें मानव की श्रेणी से नीचे न गिराया जाए।

#NarenDiaries

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