सीरवी समाज और सामाजिक समस्या


समाज वह व्यवस्था है जिसमे रहने वाले लोग परस्पर संबंधों क़े आधार पर एक -दूसरे पर अन्योन्याश्रित  रहते हैं .समाज में शांति व व्यवस्था बनाए रखने क़े लिए ,उस समाज द्वारा कुछ नियम व मर्यादाएं निरूपित की जाती हैं जिनका पालन उसमे रहने वाले लोग स्वेच्छा से करते हैं और सुखी जीवन व्यतीत करते हैं .लेकिन आज यों तो अशांति एक विश्व -व्यापी समस्या बन चुकी है परन्तु भारतीय समाज क़े सन्दर्भ में यह विकराल रूप धारण किये हुए खडी है. क्या बच्चे ,क्या बूढ़े और क्या नौजवान सभी किसी न किसी समस्या से ग्रस्त अशांत जीवन जीने को बाध्य है

निखरती है मुसीबतों से ही!
शख्सियत यारों !!
जो चट्टान से ही ना उलझे!
वो झरना किस काम का!!

प्रातः काल आँख खुलने से रात्रि में सोते समय तक प्रायः हर मनुष्य किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होकर अशांत हैं,बल्कि इसी अशांति क़े चलते कईयों की तो रात की नींद और दिन का चैन तक उड़ चुका है .छोटे -छोटे संस्कारों पर भी भव्य प्रीती -भोज तो आयोजित किये जा रहे हैं परन्तु लोगों में प्रीत -भाव का सर्वथा अभाव हैएक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ और अपने अहं की तुष्टि में ही गौर्न्वावित होना आज का सामाजिक चलन हो गया है. आज क्या ज्ञानी क्या पंडित सभी हाय -पैसा ,हाय -पैसा करते घूम रहे हैं .फिर चाहे यह पैसा वैध -विधि से हासिल हो या अनीति द्वारा सारे प्रवचन पर -उपदेश कुशल बहुतेरे सिद्ध हो रहे हैं.एक ओर भीषण बेरोजगारी है और परिवार क़े परिवार भूखे मरने को बाध्य हैं तो दूसरी ओर एक परिवार क़े पति -पत्नी और कहीं -कहीं उनके बच्चे भी ऊँची सोर्स से रोजगार संपन्न हैं.कहीं इलाज क़े लिए पैसा भी नहीं है और कहीं करोड़ों रूपये फूंक कर फाईव स्टार होटलों सरीखे अस्पतालों में इलाज चल रहा है.कोई दहेज़ न होने क़े कारण अपनी लडकी की शादी में विलम्ब से अशान्त है तो कोई लड़के की बेरोजगारी क़े कारण पुत्र -वधु लाने से वंचित हो रहा है.भूख से व्याकुल तड़पते परिवार अशान्त हैं तो गोदामों भरा अनाज सड़ाकर फेंका जा रहा है और व्यापारी इस घाटे क़े कारण अशान्त है.एक ओर कुपोषण क़े कारण करोड़ों बच्चों का भविष्य अधर में है और दूसरी ओर साधन -सम्पन्न और समृद्ध परिवारों में रक्तचाप ,ह्रदय ,मधुमेह ,गुर्दा आदि रोगों क़े कारण भोजन प्रतिबन्धित और नियन्त्रित हो रहा है.आखिर क्या है इस अशान्ति का कारण और इसे कैसे दूर किया जा सकता है ? उत्तर सरल है भारतीय समाज द्वारा अपनी पुराणी संस्कृति का विस्मरण किया जाना ही सर्वत्र अशान्ति का हेतु है और इसका निदान प्राच्य संस्कृति को अपनाने में ही है.
बहुत देख लिया आधुनिक सभ्यता और संस्कृति को जहाँ नग्न -नृत्य क़े अलावा और धरा ही क्या है ?अब तो अगर हम शान्ति चाहते हैं और दिल से सच्ची शान्ति की चाह है तो फिर देर किस बात की ? अपनी पुराणी संस्कृति को अपनाना ही होगा क्योंकि OLD is GOLD आज क़े बुजुर्ग आज की समस्याओं क़े लिए पूरी तरह उत्तरदायी हैं ,अतः नौजवानों को ही अब आगे आना होगा और अपनी पुराणी संस्कृति को गले लगाना होगा जो —-“सर्वे सन्तु निरामयः “वाली है ,”वसुधैव कुटुम्बकम “ही जिसका अभीष्ट है.सम्पूर्ण विश्व और उसके परम -पिता से प्यार करना ही अशान्ति का निदान करना है.

"सफल रिश्तों के, यही उसूल हैं,
बातें भूलिए, जो फिजूल हैं!"
🙏🙏🙏🙏

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