समाज का बेड़ा गर्क, किसने किया किसने किया
"समाज का बेड़ा, गर्क किसने किया है""🙇🙇
सच बताऊ तो, आपको आश्चर्य होगा कि, यह वही लोग है जिन्हे आप मानते है कि, उन्होने केवल अपना, अपने बीवी, बच्चों का विकास किया है, वे ही समाज का बेड़ा गरक करने मे, सबसे आगे है।
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 20 जुलाई 1952 मे विधार्थियों से अपेक्षा करते हुए कहा था कि ‘‘सामाजिक उतरदायित्व निभाने वाले विधार्थी समाज मे तैयार करने के उद्देश्य से मैंने सिद्वार्थ कॉलेज का निर्माण किया, लेकिन अनुभव बहुत कड़वा हुआ है। शिक्षा होने के बाद अच्छी नौकरी मिल गयी, बस हो गया अपना काम, इस संकुचित मानसिकता की वजह से वे भूल जाते है कि मैं कौन हॅॅू? मुझे शिक्षा किसने दी? उन्होंने कितना कष्ट सहन किया? इसकी जानकारी न रखकर, ये अपने समाज को भूल जाते है। ऐसे लोगों को क्या कहना चाहिए? समाज के विधार्थी पढ़-लिखकर समाज की तरफ देखते ही नहीं, यह समाज के साथ विश्वासघात नहीं तो और क्या हैं? मैंने अपना सारा जीवन आप लोगों के लिए लगाया है। मेरे मरने के बाद इस समाज का क्या होगा? यह चिन्ता दुर हो, ऐसी अपेक्षा के मुताबिक, अगर आप कार्य नहीं करते हो, तो मुझे लगता है कि मैंने, मेरा जीवन व्यर्थ में आपके लिए लगाया है।’’
इसी सन्दर्भ मे बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा अपने जीवन काल के उत्तरार्द्व मे अपने अनुभवो के आधार पर, बडे़े ही दुखी मन से 18 मार्च 1956, को आगरा के रामलीला मैदान मे कहा कि ’’मुझे पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया है। मैं सोचता था कि पढ़-लिखकर, यह वर्ग अपने समाज की सेवा करेगा, मगर मैं देख रहा हॅू कि, मेरे इर्द-गिर्द क्लर्कों की भीड़ इकट्ठा हुई है, जो अपना ही पेट पालने मे लगी हुई है।’’
जब समाज के पिछडेपन और बेड़ा गरक का प्रश्न उत्पन्न होता है, तो इसमे कई बिन्दुओं की भूमिका बनती है। जिसमे प्रमुख भूमिका सीनियर सीटीजन की भी बनती है।
अब आप कहेगे कैसे, क्योकि समाज का सीनियर सीटीजन वर्ग तो, समाज के विकास मे अहम् भूमिका निभाता है तो, ऐसी स्थिति मे समाज का बेड़ा गरक करने मे इसकी अहम् भूमिका कैसे हो सकती है।
तो सुनिये, आप गहराई से सोचे तो, आप अपने घर- परिवार मे ही ले लिजिए, जिसमे रीतीयो-परम्पराओं के नाम पर कई कुरितिया प्रचलित है। जब भी घर मे कोई भी समारोह होता है, जिसमे जन्म, शादी और मृत्यु प्रमुख है। वैसे कई तरह के समारोह, रीतीयो-परम्पराओं के नाम पर होते है।
कुरितिया अर्थात् वे रीतीया, जो कही न कही न्यायसंगत नही है, असामाजिक है, जिन्हें सामाजिक परम्पराओं के नाम पर फॉलो किया जाता है, वे कुरितियॉ कहलाती है।
आज की इस आधुनिक दुनिया मे, जो देश, आज से 70 वर्ष पूर्व गुलाम रहा हो और वह, आज मंगल ग्रह तक, यान भेजने मे सक्षम हो गया हो, तो आप कल्पना कर सकते है कि, देश व दुनिया ने कितनी तरक्की की है और जब से सोशल मीडिया आया है जैसेः ट्यूटर, फेसबुक, वाट्सएप्प के कारण दुनिया वास्तव मे ही छोटी नजर आती है और केवल सेकेण्डो मे सूचनाऐं देश-दुनिया के किसी भी हिस्से मे भेजी जा सकती है तथा व्यापार की बात करे तो ई-मार्केर्टिग ने, बहुत कम समय मे बाजार पर, गजब का आधिपत्य जमाया है और आने वाले 2 से 4 वर्ष मे भी और बहुत कुछ बदलने वाला है, जिसकी आप कल्पना भी नही कर सकते है।
इस बदलाव मे सबसे बड़ी भूमिका युवाओं की है और इस बात को वर्तमान मे सबसे प्रमुखता से उठाने वाले और मानने वाले भारत रत्न और मिसाईल मेन, राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम आजाद रहे। उन्होनेें विशेष तोर पर युवाओं की भूमिका पर अलग से किताब लिखी और उनके भाषण, हमेशा युवाओं कि भूमिका को इंगित करते हुए होते थे।
मेरी नजर मे, वर्तमान मे, वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनका किसी भी बिन्दु पर, अपना अलग नजरिया था और वह नजरिया विकासवान, भविष्यवादी था, जो तकनीकी व भूत-भविष्य पर खरा उतरने वाला था, जो भारत को सुपर पॉवर बनाने वाला था, जिसे सभी लोग पंसद भी करते थे, ओवर-ऑल ए. पी. जे. अब्दुल आजाद एक विचारवान, दूरदृष्टा थे । उनकी अपनी एक अलग सोच थी, जो आज सम्पूर्ण भारत मे ध्यान से देखे तो, किसी अन्य जीवित व्यक्ति मे नही है।
दुनिया को देखे तो, आज बहुत सारी कम्पनीयॉ युवाओ को, कम्पनी का सीईओ बना रही है, जबकि यदि समाज की बात करे, तो वास्तव मे सम्पूर्ण उल्टा हो रहा है। घर-परिवार मे बड़े-बुजुर्ग सामाजिक परम्पराओं के नाम पर, असामाजिक जैसेः मृत्युभोज, दहेज-प्रथा और ना-ना प्रकार की परम्पराओं का निर्वाह करवाते ओर करते है, जबकि सही मायने मे देखा जाये तो, सभी हमारे विकास मे रूकावट है।
दुनिया बदल रही है लेकिन, आज भी दलित-आदिवासी हिन्दू धर्म के नाम, अनेक असामाजिक परम्पराओें मे जकड़े हुए है जबकि युवा वर्ग इन असामाजिक परम्पराओें को छोड़ना-तोडना चाहता है लेकिन, यह बुजुर्ग उन्हें परम्पराओें के नाम पर बाध्य करते है। यह अतिमहत्वपूर्ण कारण है।
जिसने समाज का बेड़ा गरक किया है। इसके अलावा भी आप देखें, जो संस्थाऐं-संगठन समाज के विकास मे लिए बने है, उन पर भी इन्ही 60 साल की उम्र पार कर चुके, व्यक्तियों का कब्जा है। बाबा साहेब के आरक्षण की नोकरी से 60 साल तक, सरकार मे समाज का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी, इनका जि नही भरता, जो यह रिटायर्डमेन्ट के बाद अपना टाईम पास करने तथा शोकिया समाज सेवा के नाम पर, समाज की संस्थाओं व संगठनों पर कब्जा कर लेते है।
जिनकी जिम्मेवारी समाज की युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने की होती है, वे ही उनका रास्ता रोकर बैठे है और समाज मे विकास का ठिठारे पीटते है। मुझे समझ नही आता है कि, जब यह पॉवर मे रहते हुए, समाज का भला नही कर सके तो, पॉवर लेस होने के बाद, क्या और कैसे समाज का भला करेगें। वैसे दुनिया मे ऐसा कोई उदाहरण देखने को नही मिलता है कि, किसी व्यक्ति ने उम्र के उम्र के 60 पड़ाव पार करने के बाद, समाज मे कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन किया हो। मुझे तो शत-प्रतिशत शक है और इतिहास भी इस मामले मे, इनका साथ नही देता है। केवल इनके टाईम पास व शोकिया समाजसेवा के नजरिये ने समाज का बेड़ा गरक कर रखा है।
यह कई स्तरो पर, अपनी उम्र मे ज्यादा दिवाली देखने का उदाहरण देकर, युवाओ को चुप करने का प्रयास करते है। जिसमे वे कही हद तक, सफल हो भी जाते है।
जो आज के युग मे तो, कम से कम सुनवाई का उचित अधिकार दिये बिना, चुप कराना अनुचित हैै। वैसे उपरोक्त स्थितिया अधिकतर स्तरो पर पायी जाती है।
मैं यह नही कहता हूॅ कि, सभी सिनियर सिटीजन, ऐसे ही होते है, कई अच्छे ओर दूरदर्शी भी है लेकिन, उनकी सख्या बहुत कम है। आप अपने इर्द-गिर्द चलने वाली सामाजिक गतिविधियो व संस्थाओ-संगठनो को देख लिजिए, आपको पता चल जायेगा की, सच्चाई क्या है।
जबकि सरकार स्वय सिनियर सिटीजन के विचारो से इत्तेफाक नही रखती है। इसीलिए तो जिले का कलेक्टर मोस्टली, किसी युवा को बनाती है और 60 के बाद, इन्हें सेवा से मुक्त कर देती है।
कुछ भी हो, यदि वास्तव मे हमे, घर-परिवार, समाज, संस्थाओं व संगठनो का विकास करना है और अपने अधिकारो की रक्षा तथा गरिबी व पिछड़ेपन से मुक्ति पानी है, तो युवाओ को आगे लाना होगा अन्यथा आज के, डिजीटल और तकनीकी युग मे पिछड़े रह जायेगें।
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सच बताऊ तो, आपको आश्चर्य होगा कि, यह वही लोग है जिन्हे आप मानते है कि, उन्होने केवल अपना, अपने बीवी, बच्चों का विकास किया है, वे ही समाज का बेड़ा गरक करने मे, सबसे आगे है।
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 20 जुलाई 1952 मे विधार्थियों से अपेक्षा करते हुए कहा था कि ‘‘सामाजिक उतरदायित्व निभाने वाले विधार्थी समाज मे तैयार करने के उद्देश्य से मैंने सिद्वार्थ कॉलेज का निर्माण किया, लेकिन अनुभव बहुत कड़वा हुआ है। शिक्षा होने के बाद अच्छी नौकरी मिल गयी, बस हो गया अपना काम, इस संकुचित मानसिकता की वजह से वे भूल जाते है कि मैं कौन हॅॅू? मुझे शिक्षा किसने दी? उन्होंने कितना कष्ट सहन किया? इसकी जानकारी न रखकर, ये अपने समाज को भूल जाते है। ऐसे लोगों को क्या कहना चाहिए? समाज के विधार्थी पढ़-लिखकर समाज की तरफ देखते ही नहीं, यह समाज के साथ विश्वासघात नहीं तो और क्या हैं? मैंने अपना सारा जीवन आप लोगों के लिए लगाया है। मेरे मरने के बाद इस समाज का क्या होगा? यह चिन्ता दुर हो, ऐसी अपेक्षा के मुताबिक, अगर आप कार्य नहीं करते हो, तो मुझे लगता है कि मैंने, मेरा जीवन व्यर्थ में आपके लिए लगाया है।’’
इसी सन्दर्भ मे बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा अपने जीवन काल के उत्तरार्द्व मे अपने अनुभवो के आधार पर, बडे़े ही दुखी मन से 18 मार्च 1956, को आगरा के रामलीला मैदान मे कहा कि ’’मुझे पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया है। मैं सोचता था कि पढ़-लिखकर, यह वर्ग अपने समाज की सेवा करेगा, मगर मैं देख रहा हॅू कि, मेरे इर्द-गिर्द क्लर्कों की भीड़ इकट्ठा हुई है, जो अपना ही पेट पालने मे लगी हुई है।’’
जब समाज के पिछडेपन और बेड़ा गरक का प्रश्न उत्पन्न होता है, तो इसमे कई बिन्दुओं की भूमिका बनती है। जिसमे प्रमुख भूमिका सीनियर सीटीजन की भी बनती है।
अब आप कहेगे कैसे, क्योकि समाज का सीनियर सीटीजन वर्ग तो, समाज के विकास मे अहम् भूमिका निभाता है तो, ऐसी स्थिति मे समाज का बेड़ा गरक करने मे इसकी अहम् भूमिका कैसे हो सकती है।
तो सुनिये, आप गहराई से सोचे तो, आप अपने घर- परिवार मे ही ले लिजिए, जिसमे रीतीयो-परम्पराओं के नाम पर कई कुरितिया प्रचलित है। जब भी घर मे कोई भी समारोह होता है, जिसमे जन्म, शादी और मृत्यु प्रमुख है। वैसे कई तरह के समारोह, रीतीयो-परम्पराओं के नाम पर होते है।
कुरितिया अर्थात् वे रीतीया, जो कही न कही न्यायसंगत नही है, असामाजिक है, जिन्हें सामाजिक परम्पराओं के नाम पर फॉलो किया जाता है, वे कुरितियॉ कहलाती है।
आज की इस आधुनिक दुनिया मे, जो देश, आज से 70 वर्ष पूर्व गुलाम रहा हो और वह, आज मंगल ग्रह तक, यान भेजने मे सक्षम हो गया हो, तो आप कल्पना कर सकते है कि, देश व दुनिया ने कितनी तरक्की की है और जब से सोशल मीडिया आया है जैसेः ट्यूटर, फेसबुक, वाट्सएप्प के कारण दुनिया वास्तव मे ही छोटी नजर आती है और केवल सेकेण्डो मे सूचनाऐं देश-दुनिया के किसी भी हिस्से मे भेजी जा सकती है तथा व्यापार की बात करे तो ई-मार्केर्टिग ने, बहुत कम समय मे बाजार पर, गजब का आधिपत्य जमाया है और आने वाले 2 से 4 वर्ष मे भी और बहुत कुछ बदलने वाला है, जिसकी आप कल्पना भी नही कर सकते है।
इस बदलाव मे सबसे बड़ी भूमिका युवाओं की है और इस बात को वर्तमान मे सबसे प्रमुखता से उठाने वाले और मानने वाले भारत रत्न और मिसाईल मेन, राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम आजाद रहे। उन्होनेें विशेष तोर पर युवाओं की भूमिका पर अलग से किताब लिखी और उनके भाषण, हमेशा युवाओं कि भूमिका को इंगित करते हुए होते थे।
मेरी नजर मे, वर्तमान मे, वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनका किसी भी बिन्दु पर, अपना अलग नजरिया था और वह नजरिया विकासवान, भविष्यवादी था, जो तकनीकी व भूत-भविष्य पर खरा उतरने वाला था, जो भारत को सुपर पॉवर बनाने वाला था, जिसे सभी लोग पंसद भी करते थे, ओवर-ऑल ए. पी. जे. अब्दुल आजाद एक विचारवान, दूरदृष्टा थे । उनकी अपनी एक अलग सोच थी, जो आज सम्पूर्ण भारत मे ध्यान से देखे तो, किसी अन्य जीवित व्यक्ति मे नही है।
दुनिया को देखे तो, आज बहुत सारी कम्पनीयॉ युवाओ को, कम्पनी का सीईओ बना रही है, जबकि यदि समाज की बात करे, तो वास्तव मे सम्पूर्ण उल्टा हो रहा है। घर-परिवार मे बड़े-बुजुर्ग सामाजिक परम्पराओं के नाम पर, असामाजिक जैसेः मृत्युभोज, दहेज-प्रथा और ना-ना प्रकार की परम्पराओं का निर्वाह करवाते ओर करते है, जबकि सही मायने मे देखा जाये तो, सभी हमारे विकास मे रूकावट है।
दुनिया बदल रही है लेकिन, आज भी दलित-आदिवासी हिन्दू धर्म के नाम, अनेक असामाजिक परम्पराओें मे जकड़े हुए है जबकि युवा वर्ग इन असामाजिक परम्पराओें को छोड़ना-तोडना चाहता है लेकिन, यह बुजुर्ग उन्हें परम्पराओें के नाम पर बाध्य करते है। यह अतिमहत्वपूर्ण कारण है।
जिसने समाज का बेड़ा गरक किया है। इसके अलावा भी आप देखें, जो संस्थाऐं-संगठन समाज के विकास मे लिए बने है, उन पर भी इन्ही 60 साल की उम्र पार कर चुके, व्यक्तियों का कब्जा है। बाबा साहेब के आरक्षण की नोकरी से 60 साल तक, सरकार मे समाज का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी, इनका जि नही भरता, जो यह रिटायर्डमेन्ट के बाद अपना टाईम पास करने तथा शोकिया समाज सेवा के नाम पर, समाज की संस्थाओं व संगठनों पर कब्जा कर लेते है।
जिनकी जिम्मेवारी समाज की युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने की होती है, वे ही उनका रास्ता रोकर बैठे है और समाज मे विकास का ठिठारे पीटते है। मुझे समझ नही आता है कि, जब यह पॉवर मे रहते हुए, समाज का भला नही कर सके तो, पॉवर लेस होने के बाद, क्या और कैसे समाज का भला करेगें। वैसे दुनिया मे ऐसा कोई उदाहरण देखने को नही मिलता है कि, किसी व्यक्ति ने उम्र के उम्र के 60 पड़ाव पार करने के बाद, समाज मे कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन किया हो। मुझे तो शत-प्रतिशत शक है और इतिहास भी इस मामले मे, इनका साथ नही देता है। केवल इनके टाईम पास व शोकिया समाजसेवा के नजरिये ने समाज का बेड़ा गरक कर रखा है।
यह कई स्तरो पर, अपनी उम्र मे ज्यादा दिवाली देखने का उदाहरण देकर, युवाओ को चुप करने का प्रयास करते है। जिसमे वे कही हद तक, सफल हो भी जाते है।
जो आज के युग मे तो, कम से कम सुनवाई का उचित अधिकार दिये बिना, चुप कराना अनुचित हैै। वैसे उपरोक्त स्थितिया अधिकतर स्तरो पर पायी जाती है।
मैं यह नही कहता हूॅ कि, सभी सिनियर सिटीजन, ऐसे ही होते है, कई अच्छे ओर दूरदर्शी भी है लेकिन, उनकी सख्या बहुत कम है। आप अपने इर्द-गिर्द चलने वाली सामाजिक गतिविधियो व संस्थाओ-संगठनो को देख लिजिए, आपको पता चल जायेगा की, सच्चाई क्या है।
जबकि सरकार स्वय सिनियर सिटीजन के विचारो से इत्तेफाक नही रखती है। इसीलिए तो जिले का कलेक्टर मोस्टली, किसी युवा को बनाती है और 60 के बाद, इन्हें सेवा से मुक्त कर देती है।
कुछ भी हो, यदि वास्तव मे हमे, घर-परिवार, समाज, संस्थाओं व संगठनो का विकास करना है और अपने अधिकारो की रक्षा तथा गरिबी व पिछड़ेपन से मुक्ति पानी है, तो युवाओ को आगे लाना होगा अन्यथा आज के, डिजीटल और तकनीकी युग मे पिछड़े रह जायेगें।
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