सीरवी समाज और दरकते दिख रहे रिश्ते-नाते
समाज एक से अधिक लोगों के समुदाय को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते है। मानवीय क्रियाकलाप में आचरण, सामाजिक सुरक्षा और निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती है। समाज लोगों का ऐसा समूह होता है जो अपने अंदर के लोगों के मुकाबले अन्य समूहों से काफी कम मेलजोल रखता है। किसी समाज के अंतर्गत आने वाले व्यक्ति एक दूसरे के प्रति परस्पर स्नेह तथा सहृदयता का भाव रखते हैं। दुनिया के सभी समाज अपनी एक अलग पहचान बनाते हुए अलग-अलग रस्मों-रिवाज़ों का पालन करते हैं।
"सीरवी" एक क्षत्रिय कृषक जाति हैं. जो आज से लगभग 800 वर्ष पुर्व राजपूतों से अलग होकर राजस्थान के मारवाड़ व गौडवाड़ क्षेत्र में रह रही थी. कालान्तर के बाद यह लोग मेवाड़, मालवा, निम्हाड़ व देश के अन्य क्षेत्र में फेल गयें. वर्तमान में सीरवी समाज के लोग राजस्थान के अलवा मध्यप्रदेश , गुजरात , महाराष्ट्र , गोवा , कर्नाटक , आध्रप्रदेश , तमिलनाडु , केरल , दिल्ली , हिमाचल प्रदेश , दमन दीव , पांण्डिचेरी व देश के अन्य क्षैत्र में बड़ी संख्या में रह रहे हैं.
हमारे सीरवी समाज में पिछले कई बर्षों से कुप्रथाएं फैली हुई हैं। इस प्रथाओं के कारण गरीब वर्ग के लोग पिस रहे हैं। सीरवी समाज में फैली कुप्रथाओं को लोगो ने छोड़ना तो दूर कुछ लोगों ने एक कदम आगे जाकर इन कुरीतियों को सीरवी समाज की संस्कृति का चोला ओढ़ा दिया और कुछ कुरीतियों जैसा मृत्युभोज और दहेज आदि को झूठी शान का प्रतीक बना दिया। इस झूठी शान में गरीब वर्ग का आदमी कई साल से पिस रहा है।
अगर हम भारत की परंपराओं के इतिहास को देखें तो हमारे समाज में कुछ ऐसी पुरानी परम्पराऐं मिल जाएगी जो किन्ही विशेष परिस्थितियों के निराकरण के मकसद से बनाई गई थी।
हमे बहुत ही गर्व है की हमारा सीरवी समाजआज आईजी की कृपा से बहुत ही अच्छे मुकाम पर है । पर समाज मे कुछ कमियों की वजह से हमे और समाज के आगे शर्मिंदा होना पड़ता है।
पहले आटा-साटा प्रथा को कुप्रथा माना जाता था, लेकिन अब यह यहां प्रचलन में गई है। यानी घर में बेटी होने पर ही बहू मिलेगी। दो परिवार एक-दूसरे परिवार में बहू-बेटी की अदला-बदली कर लेते है। महिलाओं से चर्चा करने पर सामने आया कि सीरवी समाज में विवाह योग्य लड़कियां ही नहीं मिलती। पहले यहां एक कहावत काफी प्रचलित थी - बेटी लिज्यो जाण नै, पाणी पिज्यो छाण नै। मतलब अपने ही परिचितों, शहर में बेटी लेते-देते थे? पिछले 20 सालों में फिर ये नौबत इतनी भयावह स्थिति में आयी है कि यहां बिना किसी भी जानकारी के घरों में बहुएं लानी पड़ रही है। इस कारण यहां दलाल इतने सक्रिय है भोजन से लेकर मण्डप, पंडित तक की सारी व्यवस्थाएं वे जुटा देते है। मात्र 3 घंटे में विवाह हो जाता है।
सुनील और रेखा (बदले हुए नाम ) कुछ दिनों से विद्यालय नहीं आ रहे थे, शिक्षक ने उनके घर पर पता किया। घर पर पता करने पर मालूम चला कि पिछले 30 दिनों से सुनील और रेखा अपनी दादी के साथ रह रहे हैं और उनकी माँ को नाते भेज दिया था। सुनील के पिता का काम अहमदाबाद में काफी दिनों से ठीक नही चल रहा था तथा आर्थिक तंगी काफी ज्यादा थी। आर्थिक तंगी से परेशान होकर अपनी पत्नी काली को तीन गांव दूर नाते भेज दिया था और काली के बदले में उसने अच्छे पैसे लिये थे।
कहा जाता है, कि नाता प्रथा को विधवाओं एवं परित्यक्त स्त्रियों को सामाजिक जीवन से जोड़ने के लिए बनाया गया था। इस प्रथा के अन्तर्गत गांव के पंचों द्वारा पहली शादी के दौरान जन्में बच्चे या फिर अन्य मुद्दों पर चर्चा कर निपटारे के बाद उन्हे स्वतन्त्र जीवन की शरूआत करने की अनुमति दी जाती थी। समाज में किसी भी प्रथा का प्रारम्भ किसी विशेष उद्देश्य व सद्भावना से किया जाता है। धीरे -धीरे समय के साथ प्रथा या परम्परा को समाज अपनी आवश्यकता के अनुसार उपयोग में लेना प्रारम्भ कर देता है तो वही प्रथा , कुप्रथा में तब्दील हो जाती है।
जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया अन्य प्रथाओं की तरह इस प्रथा में भी कई परिवर्तन होते चले गए। इस प्रथा का दुरुपयोग अब औरतों की दलाली के रूप में हो रहा है। इसके जरिए कुछ पुरूष जबरदस्ती महिलाओं को दलालों के हाथों बेच रहे हैं। इसके अलावा कई पुरुष इस प्रथा की आड़़ में महिलाओं की अदला-बदली भी कर रहे हैं। पहले यह प्रथा जहां केवल गांवों में मानी जाती थी, वहीं आज के वर्तमान युग में यह बड़े कस्बों तक भी फैल चुकी है।
वहीं इस प्रथा से हो रहे सामाजिक नुकसान को रोकने के लिए वर्तमान में पंचायतों के पास कोई भी आधिकारिक नियंत्रण नहीं है जिससे नाता प्रथा आज महिलाओं के शोषण का सबसे बड़ा हथियार बन कर सामने आ रही है। इस प्रथा में महिला और पुरुष के बच्चों और दूसरे मुद्दों का निपटारा पंचायत करती है। उन्हीं के निर्णय के हिसाब से तय किया जाता है कि बच्चे किसके साथ रहेंगे। ये इसलिए किया जाता है कि ताकि बाद में महिला या पुरुष के बीच किसी चीज को लेकर मतभेद न हो। वह अपनी जिंदगी अपनी पसंद के व्यक्ति या स्त्री के साथ आराम से काट सके।
इस प्रथा के तहत परिवार के लडके की शादी कराने के लिए एक समझौता किया जाता है, जिसके तहत लडकियों की अदला-बदली की जाती है. अपने घर की लडकी को उस परिवार को दिया जाता है, जोकि उन्हें बहु देते हैं.
इस तरह के मामलों में ज्यादातर नाबालिग बच्चियां पिसती हैं, जिन्हें उनके परिवार के लोग बिना कुछ सोचे-समझे अधेड के पल्ले लगा देते हैं, लेकिन उस मासूम पर क्या बीतती है, इसको जानने की कोई कौशिश नहीं करता. ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढती जा रही है, लेकिन समाज भी इसे मूक दर्शक बनकर देखता रहता है, प्रशासन को इसकी शिकायत मिल जाए तो भले ही बच्ची बच जाती है, वरना वह अपनों के द्वारा ही एक्सचेंज कर दी जाती है.
नाता प्रथा के विषय में चर्चा करते हुए यह गलत नहीं होगा कि आज पश्चिमी राजस्थान , मध्यप्रदेश तथा गुजरात में यह प्रथा, एक सामाजिक बुराई के रूप में उभर कर आई है।
प्रथा का दुरूपयोग आज के दौर में महिलाओं की तस्करी, दलाली अथवा महिलाओं की अदला-बदली में भी किया जा रहा है और इस कार्य में समुदाय स्तर के समाज के मुख्य प्रतिनिधियों द्वारा भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया जाता है, जिनमें जाति पंच, वृद्धजन एवं आस-पास के गांव के व्यक्ति भी इसमें सम्मिलित होते है। इस पूरी प्रक्रिया में महिला की सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता है, और इसके परिणामस्वरूप वह महिला शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक रूप से चोटिल हो जाती है। प्रथा के दौरान इस प्रकार के मामलों में प्राप्त राशि को परिवार के सदस्यों यथा पिता/भाई/पति आदि में बांट दिया जाता है। प्रथा के कारण महिला की स्थिति वर्तमान में एक क्रय -विक्रय की जाने वाली वस्तु की तरह हो चुकी है। जिस प्रकार वस्तु का मुल्य वस्तु को न मिलकर उसके स्वामी को मिलता है उसी प्रकार नाता प्रथा के दौरान मिलने वाली राशि में से महिला को ना के बराबर मिलता है। वैधानिक पत्नी का दर्जा वह कभी प्राप्त नहीं कर पाती है तथा महिला की जिम्मेदारी उस नवीन परिवार को शारीरिक तथा आर्थिक सहायता करना है। वह अपना शेष जीवन उस नवीन परिवार की आर्थिक स्थिति व भावनात्मक सहायता करने में गुजर जाती है।
प्राचीनकाल से भारत की संस्कृति में नारी को पूजनीय एवं सम्मानीय माना जाता रहा है। वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण तथा परिवेश के कारण प्रथा का दुरूपयोग किया जा रहा है। आशा है कि आमजन में जागरूकता आयेगी तथा इस प्रथा का सही मायने में किसी महिला को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने व उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने में प्रयोग किया जायेगा।
है।
जरा सी चिंगारी अनुकूल हवा मिलने पर भयंकर आग का दावानल बनते देर नही लगती है !
मैंने एक पक्ष प्रस्तुत किया है इसमे सभी बाते गलत हो सकती है और सही भी हो सकती है, कुछ गलत कुछ सही हो सकती है! हम इस सम्बंध मे सभी तरह के विचार पेश करने के लिये उत्सुक रहेंगे !
इसी आशा मे………!
नरेंद्र सोलंकी
पाली राजस्थान
nkc243@gmail.com
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