अपना सीरवी समाज और सामाजिक मंथन


बस इतनी "पाकीज़ा" रहे "आईना-ऐ-ज़िन्दगी"
जब खुद से मिले "नज़र" तो "शर्मसार" ना हो

इस बार आपके लिए प्रस्तुत है
सीरवी संदेश पत्रिका में प्रकाशित लेख

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विकास की अवधारणा से अलग होती है, किसी समाज का विकसित होना ! किसी समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है की सामूहिक रूप से उस समाज का स्वरुप क्या है | उस समाज में सामूहिक हितसाधना के लिए क्या व्यवस्था है और समाज की प्रमुख संस्था किस प्रकार सार्वजानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और शेक्षणिक गतिविधियों के कार्य निष्पादित करती है| समाज के लोगों का समाज में क्या योगदान है |

सीरवी समाज में कई महत्वपूर्ण बदलाव अतिआवश्यक है | आज सीरवी समाज में कई समस्याएं है जिनमे तलाक, बुजुर्गो का उपेक्षा,अपनों से दूरियां, आटा साटा (बहू के बदले बहन कांसेप्ट) की समस्या, युवा पीढ़ी का गुमराह होना … ऐसी कई समस्याएं है| इन समस्याओं में तलाक की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ रही है

पहले विवाह एक सामाजिक बंधन था। विवाह प्रथा ही समाज के द्वारा, समाज और व्यक्ति के हित में बनाई गई है। माता पिता द्वारा तय किए गए विवाह का आज भी सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। आज भी कुल, गोत्र, जन्मकुंडली आदि देखकर ही विवाह किए जाते हैं। विवाह एक पवित्र बंधन जिसमें न केवल दो इंसान एक दूसरे की ज़िंदगी से जुडते है बल्कि दो परिवार भी एक दूसरे से जुड़ जाते है और तब कहीं जा कर बनता है एक खुशहाल और समृद्ध परिवार।आज भी दहेज के कारण विवाहों में रुकावट आ रही है। तो दुसरी और तय किए हुए विवाह एवं प्रेम विवाह भी असफल हो रहे हैं। आज समाज के विवाह योग्य युवक-युवतिया ऐसे दोराहें पर खड़े है जहां वह यह तय नहीं कर पाते है कि विवाह करें भी या नहीं क़रें? कारण आज वो अपने करीअर के प्रति सजग है, वे ज्यादा पढी लिखी भी हो गई है बौध्दिक स्तर भी बढ गया है। अपने बारे में स्वयं निर्णय लेना चाहती है, यहां तक मां बाप का फैसला उसे मंजुर नहीं।आजकल तलाक की संख्या निरंतर बढ रही है। तलाक के मामलों के कारण सीरवी समाज को दूसरे समाज के सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है |

चौतीस-पैतीस वर्ष की अवस्था में जो विवाह विच्छेद हो रहे हैं वे बहुत तनाव या असहनशीलता के कारण हो रहा है।आखिर क्या कारण है सीरवी समाज में यूं आम होते जा रहे तलाक के किस्से? कहाँ और क्या कमी आ गयी है, परवरिश में जो यह तलाक के किस्से आम हो गये हैं। क्या आज के आधुनिक सीरवी समाज में महिलाओं का होता सशक्तिकरण, या यू कहें कि बढ़ती आत्म निर्भरता है तलाक का कारण ? या फिर इस आत्म निर्भरता ने बढाया इस पुरुष प्रधान समाज के पुरुषों का अहम ? लेकिन फिर भी तलाक के सिलसिले को मद्देनज़र रखते हुए हम किसी एक पक्ष को इस विषय का पूर्णरूप से जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। क्यूंकि जिस तरह "ताली हमेशा दोनों हाथों से बजती है"।लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर वो ऐसे कौन से कारण होते हैं जो एक हँसते खेलते परिवार पर तलाक रूपी ग्रहण लगा जाते हैं। वैसे तो यहाँ मैं स्त्री या पुरुष का कोई पक्ष नहीं लेना चाहता।मेरा ऐसा मानना है कि इसके पीछे सबसे अहम कारण सहनशीलता कि कमी होना और नासमझी ही है और आज की आधुनिक जीवन शैली की अंधी दौड़ में सबसे ज्यादा अगर कुछ मायने रखता है, तो वह है पैसा।आज की पढी-लिखी लडकी नए परिवार में जल्दी शामिल नहीं हो पाती और पति के साथ अलग रहना चाहती है। यदि पति सहमत नहीं होता तो घर छोडने की धमकी देती है। ऐसे में जीवन तनावपूर्ण हो जाता है कई मामलों में पति तो कई मामलों में पत्नी तलाक देना नहीं चाहती, ऐसे में वे अलग-अलग रहने लगते हैं और उससे बच्चों पर गलत प्रभाव पडता है।तलाक जैसा फैसला बहुत ही मजबूरी में लिया जाना चाहिए। ना कि यूँ ही जैसे आज कल होता हमारे सीरवी समाज में ! कि ज़रा सी आपसी अनबन हुई नहीं कि लोगों के अहम टकराना शुरू हो जाते है और नतिजा तलाक। जबकि मेरा मानना तो यह है कि तलाक की नौबत तो तब आनी चाहिए जब दोनों में से किसी एक का जीना दुश्वार हो जाये। इतना कि ज़िंदगी जीने के लिए और कोई दूसरा विकल ही ना बचे। मगर अफसोस कि वास्तव में ऐसा होता नहीं है।तलाक किसी भी कारण हो यह है तो एक दुःखद घटना ही। पुरुष और स्त्री दोनों को ही यह समझ लेना चाहिए इसका परिणाम दोनों को ही भुगतना पडता है। यदी बच्चें है तो इसका परिणाम उन पर सबसे ज्यादा होता है कारण कभी बच्चें मां के पास तो कभी बच्चें पिता के पास। इसमें लिए हमें एक छत के नीचे बैठकर अपना समझौता करना होगा। हमे कोर्ट में जो सच्चे झूठे इल्जाम लगाकर अपमानित किया जाता है वह बडा शर्मनाक होता है। फिल्मों,टी.वी. सिरियलों के माध्यम से जो कुछ भी बताया जा रहा है तलाक का कारण उनमे से एक है तलाक सुदा महिला सुरक्षित जीवन नहीं जी पाती है।खैर पहले एक माँ अपनी बेटी को विवाह उपरांत विदा करते वक्त हमेशा यह सीख दिया करती थी, कि बेटा हमेशा बड़ों का सम्मान करना, कभी किसी को पलट कर जवाब मत देना। बड़ों को सम्मान, छोटों को प्यार, और हम उम्र को अपनापन देना। जिसके कारण बहुत सी छोटी-मोटी बातों पर परिवार में कलह होने से बच जाती थी। मगर आज की तारीख में ऐसा नहीं है। आज यदि लड़की नौकरी करती है,अर्थात खुद पैसा कमाने में सक्षम है और अपने पेरों पर खड़ी है तो उसकी माँ उसे सिखाती है, बेटा तुझे किसी से डरने या किसी के आगे झुकने की कोई जरूरत नहीं है, तू आत्मनिर्भर है इसलिए तुझे अपनी मन मर्ज़ी करने का सम्पूर्ण अधिकार है। तुझे जो पसंद ना हो तो मत करो, मना करना सीखो ना कि चुप रहकर हालातों से समझौता करना। नतीजा सब अपनी मर्ज़ी के मालिक बन अपनी-अपनी चलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसलिए तो आज कल किसी से ना डरने और दबने या किसी के आगे ना झुकने की शिक्षा दी जाती है बेटियों उनके माँ -बाप के द्वारा।जिसके कारण अहम का टकराव और नतीजा झगड़ा बढ़ते-बढ़ते नौबत तलाक तक आ पहुँचती है।

मुझे तो यह समझ नहीं आता कि कोई भी विवाहित दंपत्ति तलाक लेने से पहले आपस में बैठकर एक बार शांति से अपनी-अपनी समस्याओं पर बात क्यूँ नहीं करते कि उनको एक दूसरे से आखिर समस्या क्या है और यदि वह लोग ऐसा करते भी हैं, तो क्या एक बार भी उन्हें अपने बच्चों का ख़्याल नहीं आता ? मुझे तो लगता है कि ऐसा विचार नहीं ही आता होगा। क्यूंकि आजकल सभी सक्षम होते हैं कोई किसी के आगे खुद को कम दिखाना नहीं चाहता, जिसके चलते लोग यह भूल जाते हैं, कि बच्चों को आपका पैसा नहीं बल्कि आपके साथ की जरूरत है आप दोनों के प्यार की जरूरत है। क्यूंकि बच्चों की सही परवरिश माता या पिता दोनों में से किसी एक के अभाव में कभी पूरी नहीं हो सकती। हाँ वो अपने जीवन में एक बेहद कामयाब इंसान ज़रूर बन सकता है मगर उसके मन के अंदर उस कमी का कांटा हमेशा खटकता रहता है। फिर चाहे वह उस बात को ज़ाहिर करे या ना करे वो अलग बात है। कुछ दंपत्ति ऐसे भी होते हैं जिनके बच्चे नहीं होते लेकिन साथ गुज़ारे हुए कुछ अच्छे पलों की यादें तो होती है। मगर तब भी उन्हें उन यादों के साथ रहना मंजूर होता है बजाये खुद अपने जीवन में एक दूसरे के साथ चलते हुए नयी यादें बनाने के आखिर क्यूँ ??निरंतर बढते तलाक, टूटते परिवारों के बारे में हमे कुछ तो सोचना ही होगा। आखिर स्त्री पुरुष की ऐसी क्या लाचारी है जो उन्हें तलाक तक ले आती है। अपने समाज में तलाकों में माता-पिता भी प्रोत्साहन देते हैं। बडे घर की लडकियां विवाह पश्चात ऐडजेस्ट नही हो पाती और माता-पिता के घर लौट आती है और मां बाप भी सहानुभूति दिखा कर रोक लेते हैं परंतु बाद में उन्हें यह बहुत भारी पडता है। तलाकशुदा औरत का अकेले रहना तो दुभर हो ही जाता है फिर यदि वह पुनर्विवाह कर भी ले तो यह धब्बा कभी नहीं मिटता साथ ही इसकी भी क्या गारंटी की वो दुसरी शादी में सुखी रह सकेंगी।इसीलिए सीरवी समाज में परामर्श समिति की स्थापना की जानी चाहिये जो परिवार टूटने से बचाया जा सके। पंचायती से तो मामले बिगड़ रहे हैं !

माता-पिता को चाहिए बचपन से ही बालिकाओं को सहनशीलता का पाठ पढाएं शिक्षित होकर नारी को गर्विष्ट नहीं होना चाहिए। घर में प्रवेश करते ही भूल जाना चाहिए कि वह नौकरी पेशा नही केवल एक गृहणी है। अपने अहंकार को निकाल फेंकना चाहिए तथा पतिने परिवार का सम्मान करना चाहिए।

* एक दूसरे से सामंजस्य की कमी।
* बढती असहनशीलता।
* पति-पत्नी के अहम का टकराव।
* एक दूसरे को सुनने समझने,और सहने कि क्षमता खो देना।
* स्त्री का झुकने तैयार ना होना।
* आधुनिक जीवन शैली।
* सीरवी समाज में पैसे कमाने की अंधी दौड़।
* पति-पत्नी के विचारों का तालमेल ना हो पाना।
* लड़की के माता-पिता की गलत शिक्षा और संस्कार।
* एक दूसरे से जादा अपेक्षा रखना।
* समझौता ना करना।
* पश्चिम का प्रभाव।
* पति पत्नी में से किसी एक का थोड़ा न झुकना।
* लड़की के माता-पिता का लड़की ससुराल में जादा ताकझाक।
* पढ़ीलिखी लड़के-लडकियों का अपने आप को सर्वेश्रेष्ट समजना।
आज ये सभी तलाक के बहुत बड़े कारण है।

यदि पति-पत्नी में से कोई भी थोड़ा समझौता कर ले तो शायद आज इतनी बड़ी संख्या में तलाक के मामले सामने नहीं आएंगे। दोनों पति-पत्नी की समझदारी से विवाह की गाड़ी सही चलती है।अंततः बस यही पूछना चाहूँगा आप सभी से कि क्या आपको नहीं लगता कि पैसा कमाने और आत्मनिर्भर होने जैसी चीजों ने जहां एक ओर सीरवी समाज का विकास किया है वहीं दूसरी और फायदे से ज्यादा नुकसान भी किया है और कर भी रहा है जिसका परिणाम है यह "तलाक".

प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज के विकास में योगदान देने को तत्पर रहता है लेकिन कोई अकेला व्यक्ति अपने संसाधनों से समाज विकास नहीं कर सकता | लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्तियों द्वारा सामूहिक प्रयासों से समाज में बदलाव लाया जा सकता है |

निदान के लिए गंभीर प्रयत्न होते दिखाई नहीं देते | लोग समस्याएँ गिनवाते समय बहुत जोश और उर्जावन हो जाते हैं लेकिन इनके समाधान सुझाने में किसी की रूचि नहीं है | लोग सोचते हैं की समाज का कुछ नहीं हो सकता क्यूँ की जो समस्याएँ आज हैं वह बरसों से हैं और बरसों रहेंगी | सच है की समस्याएँ बरसों से हैं लेकिन हमें यह सोचना चाहिए की क्या किसी ने इन समस्याओं के सुधारने के प्रयास किये या नहीं ?

(आइए, कुछ सोचें और अपने सीरवी समाज पर बात करें। )

हम रोज हमारे समाज की परेशानियों के बारे में सोचते हैं और फिर कोई समाधान न निकलता देख एक एक उनको ठंडे बस्ते में डाल देते हैं..
जो हमारे पुराने समाज की समस्याएं रही हैं उनको हमलोगों ने जब सही से एड्रेस नहीं किया तो आज हमें अलग तरह की सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैं..
और ये जो issues हैं ये कोई आसमानी issues नहीं हैं ये वहीं issues हैं जो आप और हम लोग चाय की थड़ी पर, खाली बैठे होने पर, सड़क किनारे लोगो की अव्यवस्थित हालात से या फिर अखबार में और सोशल मीडिया में कुछ पढ़कर इनपे चर्चा करना आम बात हैं..

इनमें से कुछ, समाज की हकीकत- धर्म, पितृसत्ता (सारी शक्ति पुरुषों के पास होना), हिंसा (लड़ाई झगड़ा और मारपीट), निरक्षरता , अदला बदली की प्रथा, दहेज प्रथा, मृत्यु भोज,अफीम मनवार की प्रथा है। 
दूसरी और, इसके विपरीत हम सब के भीतर एक आदर्श समाज का सपना भी है जो हमें नामुमकिन लगता है..

ऊपर लिखी सारी बातें कहने सुनने के हिसाब से अच्छी लग रही हैं.. नहीं ??
ये सवाल तो हमारे सब के मन में उठता हैं तो लेकिन जवाब ये ही एक आता हैं कि मेरे अकेले से क्या होगा..

अकेले से जब नहीं होगा तो क्यों ना फिर हमको मिलकर, 
जो भी हमारे क्षेत्र में हमसे बने, वह करना चाहिए..

क्या कभी उन समस्याओं पर किसी ने कोई सही मंच पर बहस की या नहीं क्यूँ कि केवल चोपालों पर बेठ कर मनोरंजन के लिए बहस करने से कोई हल नहीं होती इसके लिए लोगों को सार्थक प्रयास करने होंगे तभी हम एक मजबूत समाज बना पाएंगे |

जरा सी चिंगारी अनुकूल हवा मिलने पर भयंकर आग का दावानल बनते देर नही लगती है !

मैंने एक पक्ष प्रस्तुत किया है इसमे सभी बाते गलत हो सकती है और सही भी हो सकती है, कुछ गलत कुछ सही हो सकती है! हम इस सम्बंध मे सभी तरह के विचार पेश करने के लिये उत्सुक रहेंगे !

इसी आशा मे………!

 
लेखक
> नरेंद्र सोलंकी s/o यशवंत राज चौधरी (अध्यापक)
> 11 लक्ष्मी नगर 
> सरदार समंद रोड 
> पाली राजस्थान

> Contact
> 9782707779
nkc243@gmail.com

Comments

  1. Shi hai ap ki bat ladkiya toda kehna man le to koi prblm nhi aati

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